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FY27 में १४% रहेगी क्रेडिट ग्रोथ, लिक्विडिटी और CD रेशियो सुधारने में सरकारी बैंक रहेंगे आगे

नई दिल्ली: भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के लिए नया वित्त वर्ष (FY27) स्थिरता और प्रगति लेकर आने वाला है। प्रमुख ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (MOFSL

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admin
2026-07-06
FY27 में १४% रहेगी क्रेडिट ग्रोथ, लिक्विडिटी और CD रेशियो सुधारने में सरकारी बैंक रहेंगे आगे
FY27 में १४% रहेगी क्रेडिट ग्रोथ, लिक्विडिटी और CD रेशियो सुधारने में सरकारी बैंक रहेंगे आगे

 नई दिल्ली: भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के लिए नया वित्त वर्ष (FY27) स्थिरता और प्रगति लेकर आने वाला है। प्रमुख ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (MOFSL) की होरिजेंटल रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष २०२७ में बैंकों की लोन ग्रोथ (क्रेडिट ग्रोथ) सालाना आधार पर १४ प्रतिशत रहने का अनुमान है। खास बात यह है कि इस ग्रोथ और क्रेडिट-टू-डिपॉजिट (CD) रेशियो में सुधार का नेतृत्व निजी बैंकों के बजाय सरकारी बैंक (PSBs) करते हुए नजर आएंगे। यह बदलाव देश में लोन की मजबूत मांग और बैंकों की बदलती लिक्विडिटी आवश्यकताओं को रेखांकित करता है।

बैंकिंग प्रणाली में लिक्विडिटी (नकदी) संकट को दूर करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने ३ से ५ साल की अवधि वाले विदेशी मुद्रा अनिवासी-B यानी FCNR(B) डिपॉजिट्स को कैश रिजर्व रेशियो (CRR) और स्टेट्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो (SLR) की अनिवार्यताओं से पूरी तरह छूट दे दी है। मोतीलाल ओसवाल के अनुसार, आरबीआई के इस अकेले फैसले से वित्त वर्ष २०२७ में देश के भीतर ४० से ५० अरब डॉलर (लगभग ३.३ से ४.१ लाख करोड़ रुपये) का भारी विदेशी मुद्रा प्रवाह होने की उम्मीद है, जिससे बैंकों की बिजनेस ग्रोथ को जबरदस्त बूस्ट मिलेगा।

 रिपोर्ट के मुताबिक, १५ जून २०२६ तक बैंकिंग प्रणाली की सिस्टेमिक क्रेडिट ग्रोथ सालाना आधार पर १७.७ प्रतिशत दर्ज की जा चुकी थी। इस तेजी के पीछे कच्चे माल और इनपुट लागत में बढ़ोतरी के कारण कंपनियों द्वारा वर्किंग कैपिटल लोन की बढ़ती मांग है। इसके अलावा, वित्त वर्ष २०२७ की पहली तिमाही में बॉन्ड यील्ड बढ़ने की वजह से कॉरपोरेट्स ने बाजार से फंड जुटाने के बजाय सीधे बैंकों से कर्ज लेने को प्राथमिकता दी है।

 ब्याज दरों और शुद्ध ब्याज मार्जिन (NIM) की बात करें, तो मई २०२६ में नए कर्जों पर यील्ड में सरकारी बैंकों के लिए ६ बेसिस पॉइंट (bps) की बढ़त देखी गई, जबकि निजी बैंकों के लिए यह ७ bps गिर गई। पिछले ६ महीनों से रेपो रेट स्थिर रहने के कारण बैंकों के मार्जिन पर हल्का दबाव है। हालांकि, राहत की बात यह है कि बैंकों की एसेट क्वालिटी (लोन रिकवरी स्थिति) बेहद मजबूत बनी हुई है और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक संकट का भी इस पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा है। आने वाले समय में कॉर्पोरेट लोन, एमएसएमई (MSME) और गोल्ड लोन इस ग्रोथ के मुख्य इंजन बने रहेंगे।

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